अल्लाहु अकबरुल्ला हु अकबर
गूंजी सदा जो अल्लाहु अकबर ज़मीन पर
रह़मत के फ़ूल खिल गए बंजर ज़मीन पर
अल्लाहु अकबरुल्ला हु अकबर
क़ुदसी पढ़ेंगे नातें उतर कर ज़मीन पर
अब आ गए हैं मालिके कौसर ज़मीन पर
अल्लाहु अकबरुल्ला हु अकबर
छोड़ूंगा नहीं इश्के नबी बोले यह बिलाल
चाहे बिछादे शोले सितमगर ज़मीन पर
अल्लाहु अकबरुल्ला हु अकबर
कहता है चांद देख के हुसने रसूल को
क़दमों से लिपट जाऊं मैं जाकर ज़मीन पर
अल्लाहु अकबरुल्ला हु अकबर
ताहिर फलक़ ज़मीन का करता है एतराम
है मुस्तफा का रौजा़ ए अनवर ज़मीन पर
नात ख़्वां
ताहिर रज़ा रामपुरी
यह कलाम अल्लाह की बड़ाई और इश्क-ए-रसूल ﷺ का दिलकश बयान है।
खास मिसरे:
- रहमत के फूल खिल गए बंजर ज़मीन पर,
अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। - छोड़ूंगा नहीं इश्के नबी बोले यह बिलाल,
चाहे बिछा दे शोले सितमगर ज़मीन पर। - कहता है चांद देख के हुस्ने रसूल को,
क़दमों से लिपट जाऊं मैं जाकर ज़मीन पर।
conclusion:
नात ख्वां ताहिर रज़ा रामपुरी ने इस कलाम में मुस्तफा ﷺ की अज़मत, इश्क-ए-रसूल ﷺ, और कायनात की उनके रौज़े-ए-अनवर पर अकीदत को बयान किया है। हर लफ्ज़ रूहानी सकून और मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ का पैग़ाम देता है।