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रुत्बा ये विलायत में क्या ग़ौस ने पाया है / al madad peerane peer | Gause Azam Dastageer

अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर
अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर

रुत्बा ये विलायत में क्या ग़ौस ने पाया है
अल्लाह ने वलियों का सरदार बनाया है
है दस्ते अली सर पर हसनैन का साया है
मेरे ग़ौस की ठोकर ने मुर्दों को जिलाया है

अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर
अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर

लाखों ने उसी दर से तक़दीर बना ली है
बग़दादी सँवरिया की हर बात निराली है
डूबी हुई कश्ती भी दरिया से निकाली है
ये नाम अदब से लो ये नाम जलाली है

अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर
अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर

हर फ़िक्र से तुम हो कर आज़ाद चले जाओ
ले कर के लबों पर तुम फ़रियाद चले जाओ
मिलना है अगर तुम को वलियों के शहंशा से
ख़्वाजा से इजाज़त लो बग़दाद चले जाओ

अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर
अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर

ग़ौर कीजे कि निगाहे ग़ौस का क्या हाल है
है क़ुतुब कोई वली कोई कोई अब्दाल है
दूर है जो ग़ौस से बद बख़्त है बद-हाल है
जो दीवाना ग़ौस का है सब में बे मिसाल है
दीन में ख़ुशहाल है दुनिया में माला माल है

अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर
अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर

मिलने को शमा से ये परवाना तड़पता है
क़िस्मत के अँधेरों में दिन-रात भटकता है
इस इश्के़ हक़ीक़ी में इतना तो असर आए
जब बंद करूँ आँखें बग़दाद नज़र आए

अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर
अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर

अंदाज़ बयाँ उन का हम कर नहीं पाएँगे
अजमेर से हो कर हम बग़दाद को जाएँगे
जब आए बला हम पर हम उन को बुलाएँगे
तुम दिल से सदा तो दो वो हाथ बढ़ाएँगे

अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर
अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर

या ग़ौस करम कर दो या ग़ौस करम कर दो
वो दीन की दौलत से दामन को मेरे भर दो
बस इतनी गुज़ारिश है बस एक नज़र कर दो
बग़दाद की गलियों में छोटा सा मुझे घर दो

अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर
अल मदद पीराने पीर ग़ौसे आज़म दस्त गीर

नात ख़्वां
मुईन क़ादरी

About: al madad peerane peer lyrics | Ghaus-ul-Azam Dastageer

रुतबा यह विलायत में क्या घौस ने पाया है एक बहुत ही असर अंगेज और दिल को छू लेने वाली मन्कबत है, जो हर शेर में इश्क और मोहब्बत का गहरा एहसास पैदा करती है। इसमें हज़रत गौस-ए-आज़म (रहमतुल्लाह अलै) की अजमत और उनकी दुआओं के असरात को बयान किया गया है।

यह मन्कबत न सिर्फ उनके रूहानी रुतबे को उजागर करती है, बल्कि उनके दर पर जाने और उनकी शफाअत की दुआ से सच्चे रास्ते की तरफ रहनुमाई फराहम करती है। घौस-ए-आज़म की ठोकर से मर्दों को जिंदा करने की बात, उनके दर से तक़दीर बदलने और उनके जलाली असरात को बहुत खूबसूरती से बयान किया गया है। मन्कबत की असली खूबसूरती यह है कि यह सिर्फ एक तारीफ नहीं, बल्कि एक गहरी रूहानी आवाज है जो समाईन को नई तवानाई और रूहानियत का एहसास दिलाती है।

बगदाद की गलियों में घर बनाने की ख्वाहिश और गौस-ए-आज़म की सिफात का तज़किरा हमें यह बताता है कि सच्चा आशिक हमेशा उस रास्ते की तरफ माइल होता है जो सच्चाई और हक की तरफ ले जाता है। मोईन कादरी की आवाज में वह खास बात है जो समाईन को इस रूहानी सफर का हिस्सा बना देती है, जैसे हम भी घौस-ए-आज़म के दर पर खड़े हैं और उनकी दुआओं का असर महसूस कर रहे हैं। यह मन्कबत सिर्फ एक मज़हबी कलाम नहीं, बल्कि एक ज़िंदा रहनुमाई है जो हमें अपने रूहानी सफर में आगे बढ़ने की ताकत देती है।