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दिल की ये आरज़ू है सरकार आते जाते | dil ki ye aarzoo hai sarkar aate jaate

दिल की ये आरज़ू है सरकार आते जाते,
में आप को सुनाऊँ अशआर आते जाते.

उठ कर अभी हैं आए फिर दोड़ जा रहे हैं
थकते नहीं हैं आशिक़ सो बार आते जाते

दिल की ये आरज़ू है सरकार आते जाते,
में आप को सुनाऊँ अशआर आते जाते.

दिल की ये आरज़ू है सरकार आते जाते,
में आप को सुनाऊँ अशआर आते जाते.

ऐं काश मेरा होता छोटा सा घर वहीं पर
में सूब्हो-शाम करता दीदार आते जाते

हसरत यही है सर पर दस्ते-शिफ़ा वो रखते
हो जाऊं जब वहाँ में बीमार आते जाते

जिस रास्ते से होकर हज़रत उमर गुज़र ते
उस रह पे कांप ते थे कुफ़्फ़ार आते जाते

जाएगा जो भी मिलने एक बार मुसतफ़ा से
उस को अली मिलेंगे दौ बार आते जाते

हर गिज़ ना याद आए फिर उसको मन्नों-सलवा
तैबा में जो भी करले इफ्तार आते जाते

दिल की ये आरज़ू है सरकार आते जाते,
में आप को सुनाऊँ अश्आर आते जाते.

नात ख्वां
मुहम्मद अली फैज़ी


मुहम्मद अली फैज़ी की यह नज़्म एक अकीदतमंद की गहरी आरज़ू को बयान करती है जो “सरकार” (मुहतरम हस्ती) के लिए है। इसकी मौज़ू ज़ुबान और जज़्बाती अल्फाज़ में, शायर एक मुबारक मकाम पर अशआर सुनाने की शिद्दत से ख्वाहिश करता है। यहाँ बनाई गई तस्वीरें रूहानी तजुर्बा कराती हैं, क्योंकि शायर एक छोटे से घर का तसव्वुर करता है जहाँ वो इन लम्हों का लुत्फ़ उठा सके।

बार-बार दोहराई जाने वाली यह दुआ इन मुलाकातों की आरज़ु को ज़ाहिर करती है, जिससे इश्क और ईमान का यह सफर नुमाया होता है। फैज़ी ज़ाती चाहत को ईमान के आम मौजुआत के साथ खूबसूरती से बुनते हैं, इश्क वालों और मोमिनों की बेइंतहा कोशिशों को उजागर करते हैं। ऐतिहासिक शख्सियत और मुबारक मुकामात का हवाला इस नज़्म को घनी करता है, इसकी रूहानी अहमियत को बढ़ाता है।

मुहम्मद अली फैज़ी का यह कलाम इबादत और आरज़ू का एक दिल से खिराज-ए-तहसीन है, जो कई सतहों पर क़ारियों के साथ गूंजता है। यह नज़्म न सिर्फ़ एक ज़ाती ख्वाहिश की आहिस्ती करती है बल्कि तमाम रूहानी तलाशी वालों की मुश्तर्का आरज़ू को भी समेटे हुए है, जिसके वजह से यह उर्दू शायरी का एक लाज़मी हिस्सा बन जाती है।