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शबे फुरक़त है दिल में इज़्तेराब आया तो क्या होगा / Shabe furqat hai dil mein izteraab aaya to kya hoga

शबे फुरक़त है दिल में इज़्तेराब आया तो क्या होगा
जो इस जु़ल्मत से मिलने आफ़ताब आया तो क्या होगा

लिखे हैं ख़त जो आका़ को पसेमानी के अश्को़ं से
किसी दिन उस मेहरबा का जवाब आया तो क्या होगा

सदा जिस नाज़ मी पैकर को सोचा ही किया मैंने
कभी जो ख़्वाब में वो बे हिजाब आए तो क्या होगा

मैं सहराए अतश में कै़स की मानिंद जो भटकूं
अगर सर चश्मए ह़क़ का लुआ़ब आया तो क्या होगा

ख़्यालों में जो मक्के की ज़फरया बी चली आई
अचानक बुदकदे में इंकलाब आया तो क्या होगा

नात ख्वां
मोहम्मद अली फैज़ी

About: Shabe furqat hai dil mein izteraab aaya to kya hoga

यह अश्आ़र हिदायत की तलब और नूर-ए-इलाही की तसव्वुराती खू़बसूरती को बयान करता है। आफ़ताब का इस्तेलाह, रुहानी नजात और दिल की राहत का पेगाम देता है।

इस शेर में इंसानी दिल की बेचैनी और रहमत-ए-ख़ुदा की आरज़ू का बेहतरीन इज़हार है। ये अश्आ़र न सिर्फ इश्क़-ए-रसूल की गहराई में ले जाते हैं बल्कि ईमान और तसव्वुर को नई बलंदी अता करते हैं। क़ारी मोहम्मद अली फैज़ी का अंदाज़-ए-बयाँ का़बिल-ए-दाद है।