याद आया मदीना हुई आंख नम
दिल को समझाऊं कैसे बता दीजिए
या तो मुझको मदीना बुला लीजिए
या तो दिल को मदीना बना दीजिए
आपको याद करके ही सोता हूं मैं
आपकी याद आने पे रोता हूं मैं
मेरे दिल में बसी है यही आरज़ू
या नबी अपना जलवा दिखा दीजिए
घर से तलवार लेकर गए थे मगर
मिल गई जब नबी की नज़र से नज़र
गिर के क़दमों में कहने लगे यह उमर
मुझको सरकार कलमा पढ़ा दीजिए
कौन अपना है और कौन है दूसरा
उसका लेना हो गर आपको जायज़ा
कुछ नहीं बस यही है मेरा मशवरा
आला ह़ज़रत का नारा लगा दीजिए
बाप देता है हिम्मत तो मां हौसला
पूरी दुनिया में है ऐसी दौलत कहां
आप दोनों की खिदमत करूूं मैं सदा
मेरी अम्मी मुझे बस दुआ दीजिए
वास्ते किसके काबे का दर है खुला
फख़रे अज़हर का किसको लक़ब है मिला
कोई तुझ से जो पूछे, ऐं अ़ज़मत रज़ा
वो हैं ताजुश्शरिया, बता दीजिए
नात ख़्वां
अज़मत रज़ा भागलपुरी
About: yaad aaya madina hui aankh nam | by azmat raza bhagalpuri
यह कलाम इश्क़-ए-रसूल ﷺ तड़पते दिल की आरज़ू, माँ-बाप की अज़मत और बुज़ुर्गों की शान को बेहतरीन अंदाज़ में बयान करता है |
खास मिसरे:
- या तो मुझको मदीना बुला लीजिए,
- या तो दिल को मदीना बना दीजिए।
- बाप देता है हिम्मत तो माँ हौसला,
- पूरी दुनिया में है ऐसी दौलत कहां।
हज़रत उमर रज़ि. की दास्तान और आला हज़रत की अकीदत का ज़िक्र इसे और भी पुरअसर बना देता है। हज़रत अज़मत रज़ा भागलपुरी का अंदाज़-ए-बयाँ दिल को छू लेने वाला है। कलाम सुनने वाले के दिल में इश्क़ और अक़ीदत की लौ जला देता है।